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20 Bodh Katha | Moral Stories in Hindi | हिंदी बोध कथा प्रेरणादायक बोध कथा

प्रेरणादायक बोध कथा | Moral Stories in Hindi

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उसने कहा था - हिंदी बोध कथा

लड़की : अरे ये क्या कर रहे हो ?
लड़का: दिख नहीं रहा बुद्धू पौधा लगा रहा हूँ !
लड़की : वो तो दिख ही रहा है पर अचानक क्या सूझी ?
लड़का : आज तुम्हारा जन्मदिन है ना.. तो मैंने तय किया है कि तुम्हारे हर जन्मदिन पर एक पौधा लगाउँगा और देखना एक दिन ये सारे पौधे विशाल पेड़ बनेंगे और बग़ीचे का हर कोना तुम्हारे अहसास से भरा होगा मेरे दिल की तरह,और जब हमारे बच्चे और बच्चों के बच्चे होंगे ना वो सब भी तुम्हारे नाम की ऑक्सिजन लेंगे"।
लड़की ने ज़ोर का ठहाका लगाया और बोली "तुम सच में पागल हो गए हो और बता देती हूँ जनाब आपका ये पैधे लगाने वाला आइडीया ज़्यादा से ज़्यादा तीन साल तक चलेगा फिर भूल जाओगे तुम जैसे हर चीज़ भूलते हो"।
लड़के के चेहरे का भाव बदल गया।"ऐसे मत कहो ना यार,और जब मैं कोई चीज़ दिल से करता हूँ ना तो उसे कभी नही भूलता "।
लड़की बोली "तो फिर वादा करो तुम ज़िंदगी भर मेरे हर जन्मदिन पर यहाँ पौधे लगाओगे चाहे हम साथ हो या ना हो..
लड़का बोला 'मैं वादा करता हूँ.. मगर आगे से कभी तुम ये साथ ना रहने की बात नहीं करोगी"।
लड़की ने प्यार से उसे ज़ोर से गले लगा लिया।ओह मेरे डब्बू....
पूरे बीस साल हो गए...
न जाने वो वक़्त की कौनसी अभागिन घड़ी थी जिसने दोनो को जुदा कर दिया था आज लड़की फिर उसी शहर में थी.. वहाँ का हर कोना,हर गली,हर जगह,लड़के की याद दिला रही थी.. लड़की की नज़रें लड़के की एक झलक के लिए तरस रही थी मगर वो कहीं नहीं दिखा.. "बस वक्त की ऐसी मार पड़ी और उन्हें बिछड़ना पड़ा और जाते हुए आख़री बार उसी ने तो उससे वादा लिया था के कभी पलट के नहीं आओगे मेरी ज़िंदगी में"।
तेज़ बारिश हो रही थी भीगते हुए चलते-चलते उसके क़दम ख़ुद ही उस बग़ीचे की तरफ़ बढ़ने लगे, वहाँ पहुँचते ही उसका गला भर आया।यही वह जगह थी जहाँ उसने लड़के के साथ अपने जीवन के सबसे बेहतरीन और सुकून भरे पल गुज़ारे थे.. अंदर जा कर देखा तो बग़ीचा बेहद ख़ूबसूरत और हरा-भरा दिख रहा था और तभी अचानक उसकी नज़र लड़के पर पड़ी जो वहाँ बैठा पौधा लगा रहा था।उसे देखते ही वो ख़ुद को रोक नहीं पायी और दौड़ के उसे गले लगा लिय।फूट फूट के रोने लगी.. लड़का कुछ नही बोला बस मौन खड़ा रहा.. तभी एक लड़की आयी और बोली "सॉरी आंटी मेरे पापा कई साल पहले अपनी याददाश्त खो चुके हैं.. ही इज़ अल्ज़ाइमर पेशंट" कई सालों से वो जुलाई की हर सात तारीख़ को बस एक बार यहाँ आते हैं और एक पौधा लगा जाते हैं" जब भी हम इसका कारण पूछते है तो इनका एक ही जवाब होता है- "उसने कहा था" आइये हम भी आने वाले वंश के लिए ऑक्सीजन का प्रबंध करे- ओर घर परिवार में हर शुभ मौके पर एक पौधा अवश्य लगाए- डॉ दर्शन बांगिया

हम सबके पास दो अनमोल हीरे है - प्रेरक प्रसंग स्टोरी इन हिंदी

एक सौदागर को बाज़ार में घूमते हुए एक उम्दा नस्ल का ऊंट दिखाई पड़ा , सौदागर और ऊंट बेचने वाले के बीच काफी लंबी सौदेबाजी हुई और आखिर में सौदागर ऊंट खरीद कर घर ले आया।
घर पहुंचने पर सौदागर ने अपने नौकर को ऊंट का कजावा ( काठी) निकालने के लिए बुलाया।
कजावे के नीचे नौकर को एक छोटी सी मखमल की थैली मिली जिसे खोलने पर उसे कीमती हीरे जवाहरात भरे होने का पता चला.. नौकर चिल्लाया,"मालिक आपने ऊंट खरीदा, लेकिन देखो, इसके साथ क्या मुफ्त में आया है!"
सौदागर भी हैरान था, उसने अपने नौकर के हाथों में हीरे देखे जो कि चमचमा रहे थे और सूरज की रोशनी में और भी टिम टिमा रहे थे ।
सौदागर बोला: " मैंने ऊंट ख़रीदा है, न कि हीरे, मुझे उसे फौरन वापस करना चाहिए!"
नौकर मन में सोच रहा था कि मेरा मालिक कितना बेवकूफ है ! बोला: "मालिक किसी को पता नहीं चलेगा!" पर, सौदागर ने एक न सुनी और वह फौरन बाज़ार पहुंचा और दुकानदार को मख़मली थैली वापिस दे दी ।
ऊंट बेचने वाला बहुत ख़ुश था, बोला, "मैं भूल ही गया था कि अपने कीमती पत्थर मैंने कजावे के नीचे छुपा के रख दिए थे । अब आप इनाम के तौर पर कोई भी एक हीरा चुन लीजिए, "सौदागर बोला," मैंने ऊंट के लिए सही कीमत चुकाई है इसलिए मुझे किसी शुक्राने और ईनाम की जरूरत नहीं है!" जितना सौदागर मना करता जा रहा था, ऊंट बेचने वाला उतना ही ज़ोर दे रहा था।
आख़िर में सौदागर ने मुस्कुराते हुए कहा: असलियत में जब मैंने थैली वापस लाने का फैसला किया तो मैंने पहले से ही दो सबसे कीमती हीरे इसमें से अपने पास रख लिए थे ।
इस कबूलनामें के बाद ऊंट बेचने वाला भड़क गया उसने अपने हीरे जवाहरात गिनने के लिए थैली को फ़ौरन खाली कर लिया । पर वह था बड़ी पशोपेश में बोला,"मेरे सारे हीरे तो यही है, तो सबसे कीमती दो कौन से थे जो आपने रख़ लिए?"
सौदागर बोला: " मेरी ईमानदारी और मेरी खुद्दारी " हमें अपने अन्दर झांकना होगा कि हम में से किस किस के पास यह 2 हीरे है। जिन जिन के पास यह 2 हीरे है वह दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं।

स्वाहा - बहुत सुंदर हिंदी बोध कथा

मैं एक गृह प्रवेश की पूजा में गया था पंडितजी पूजा करा रहे थे । पंडितजी ने सबको हवन में शामिल होने के लिए बुलाया । सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई । पंडितजी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा ।” लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते, गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई ।
हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए, गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे । उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए ।
मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई, सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई ।
"घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था ।" हवन पूरा होने के बाद पंडितजी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे अग्नि में डाल दें । गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें । एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई । सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया । पूरा घर धुंए से भर गया । वहां बैठना मुश्किल हो गया, एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए ।
अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था । काफी देर तक इंतज़ार करना पड़ा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में ।
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......मेरी कहानी यहीं रुक जाती है ।
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उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है । पर सभी ने उसे बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी या खत्म न हो जाए ?
ऐसा ही हम करते हैं । यही हमारी फितरत है । हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं । जो अंत मे जमीन जायदाद और बैंक बैलेंस के रूप में यहीं पड़ा रह जाता है।
ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है । हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि यह भी भूल जाते है कि सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले ही है, उसे बचा कर क्या करना । बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही होना है !! "संसार" हवन कुंड है और "जीवन" पूजा । एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है । अच्छी पूजा वही है, जिसमें..."हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो" न सामग्री खत्म हो ! न बची रह जाए !! यही मेनेजमेन्ट करना है !!!

चिड़िया की परेशानी

कैसोवैरी चिड़िया को बचपन से ही बाकी चिड़ियों के बच्चे चिढाते थे। कोई कहता, ” जब तू उड़ नहीं सकती तो चिड़िया किस काम की।”, तो कोई उसे ऊपर पेड़ की डाल पर बैठ कर चिढाता कि,” अरे कभी हमारे पास भी आ जाया करो…जब देखो जानवरों की तरह नीचे चरती रहती हो…” और ऐसा बोलकर सब के सब खूब हँसते! कैसोवैरी चिड़िया शुरू-शुरू में इन बातों का बुरा नहीं मानती थी लेकिन किसी भी चीज की एक सीमा होती है।
बार-बार चिढाये जाने से उसका दिल टूट गया! वह उदास बैठ गयी और आसमान की तरफ देखते हुए बोली, “हे ईश्वर, तुमने मुझे चिड़िया क्यों बनाया…और बनया तो मुझे उड़ने की काबिलियत क्यों नहीं दी… देखो सब मुझे कितना चिढ़ाते हैं… अब मैं यहाँ एक पल भी नहीं रह सकती, मैं इस जंगल को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ कर जा रही हूँ!” और ऐसा कहते हुए कैसोवैरी चिड़िया आगे बढ़ गयी। अभी वो कुछ ही दूर गयी थी कि पीछे से एक भारी-भरकम आवाज़ आई- रुको कैसोवैरी ! तुम कहाँ जा रही हो! कैसोवैरी ने आश्चर्य से पीछे मुड़ कर देखा, वहां खड़ा जामुन का पेड़ उससे कुछ कह रहा था। “कृपया तुम यहाँ से मत जाओ! हमें तुम्हारी ज़रुरत है। पूरे जंगल में हम सबसे अधिक तुम्हारी वजह से ही फल-फूल पाते हैं…. वो तुम ही हो जो अपनी मजबूत चोंच से फलों को अन्दर तक खाती हो और हमारे बीजों को पूरे जंगल में बिखेरती हो…हो सकता है बाकी चिड़ियों के लिए तुम मायने ना रखती हो लेकिन हम पेड़ों के लिए तुमसे बढ़कर कोई दूसरी चिड़िया नहीं है…मत जाओ…तुम्हारी जगह कोई और नहीं ले सकता!” पेड़ की बात सुन कर कैसोवैरी चिड़िया को जीवन में पहली बार एहसास हुआ कि वो इस धरती पर बेकार में मौजूद नहीं है, भगवान् ने उसे एक बेहद ज़रूरी काम के लिए भेजा है और सिर्फ बाकी चिड़ियों की तरह न उड़ पाना कहीं से उसे छोटा नहीं बनाता! आज एक बार फिर कैसोवैरी चिड़िया बहुत खुश थी, वह ख़ुशी-ख़ुशी जंगल में वापस लौट गयी। Friends, कैसोवैरी चिड़िया की तरह ही कई बार हम इंसान भी औरों को देखकर low feel करने लगते हैं। हम सोचते हैं कि उसके पास ये है…उसके पास वो है….सब कितनी lucky हैं…
हमें कभी भी इस तरह के बेकार comparisons में नहीं पड़ना चाहिए! हर एक इंसान अपने आप में unique है…अलग है। हर किसी के अन्दर कोई न कोई बात है जो उसे ख़ास बनाती है..हाँ हो सकता है कि वो पूरी दुनिया के लिए बस एक इंसान हो लेकिन किसी एक के लिए वो पूरी दुनिया हो सकता है। इसलिए life की importance को समझिये और अपने इस अमूल्य जीवन को positive thoughts का तोहफा दीजिये….यकीन जानिये सकारात्मक सोच का ये एक तोहफा आपकी पूरी लाइफ को शानदार बना देगा! ओर अगर depression या anxiety का शिकार हो चुके है तो वहां से भी बाहर निकाल लाएगा। 

लकड़हारा

सुनसान जंगल में एक लकड़हारे से पानी का लोटा पीकर प्रसन्न हुआ राजा कहने लगा― हे पानी पिलाने वाले ! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा, लकड़हारे ने कहा―बहुत अच्छा।
इस घटना को घटे पर्याप्त समय व्यतीत हो गया, अन्ततः लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा― मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था, राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि- इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ ? अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल उद्यान(बाग) उसको सौंप दिया। लकड़हारा भी मन में प्रसन्न हो गया। चलो अच्छा हुआ। इस बाग के वृक्षों के कोयले खूब होंगे, जीवन कट जाएगा। यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन चन्दन काट-काटकर कोयले बनाने लगा और उन्हें बेचकर अपना पेट पालने लगा। थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर बगीचा एक वीरान बन गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।
राजा को एक दिन यूँ ही विचार आया। चलो, तनिक लकड़हारे का हाल देख आएँ। चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा। यह सोचकर राजा चन्दन के उद्यान की और जा निकला। उसने दूर से उद्यान से धुआँ उठते देखा। निकट आने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन जल रहा है और लकड़हारा पास खड़ा है। दूर से राजा को आते देखकर लकड़हारा उसके स्वागत के लिए आगे बढ़ा। राजा ने आते ही कहा― भाई ! यह तूने क्या किया ? लकड़हारा बोला― आपकी कृपा से इतना समय आराम से कट गया। आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा कल्याण किया। कोयला बना-बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो कुछ ही वृक्ष रह गये हैं। यदि कोई और उद्यान मिल जाए तो शेष जीवन भी व्यतीत हो जाए।
राजा मुस्कुराया और कहा― अच्छा, मैं यहाँ खड़ा होता हूँ। तुम कोयला नहीं, प्रत्युत इस लकड़ी को ले-जाकर बाजार में बेच आओ। लकड़हारे ने दो गज [लगभग पौने दो मीटर] की लकड़ी उठाई और बाजार में ले गया। लोग चन्दन देखकर दौड़े और अन्ततः उसे तीन सौ रुपये मिल गये, जो कोयले से कई गुना ज्यादा थे।
लकड़हारा मूल्य लेकर रोता हुआ राजा के पास आय और जोर-जोर से रोता हुआ अपनी भाग्यहीनता स्वीकार करने लगा। इस कथा में चन्दन का बाग मनुष्य का शरीर और हमारा एक-एक श्वास चन्दन के वृक्ष हैं पर अज्ञानता वश हम इन चन्दन को कोयले में तब्दील कर रहे हैं। लोगों के साथ बैर, द्वेष, क्रोध, लालच, ईर्ष्या, मनमुटाव, को लेकर खिंच-तान आदि की अग्नि में हम इस जीवन रूपी चन्दन को जला रहे हैं। जब अंत में स्वास रूपी चन्दन के पेड़ कम रह जायेंगे तब अहसास होगा कि व्यर्थ ही अनमोल चन्दन को इन तुच्छ कारणों से हम दो कौड़ी के कोयले में बदल रहे थे, पर अभी भी देर नहीं हुई है हमारे पास जो भी चन्दन के पेड़ बचे है उन्ही से नए पेड़ बन सकते हैं। योगा से, आपसी प्रेम, सहायता, सौहार्द, शांति,भाईचारा, और विश्वास, के द्वारा अभी भी जीवन सँवारा जा सकता है।

समझदार बहू

शाम को गरमी थोड़ी थमी तो मैं पड़ोस में जाकर निशा के पास बैठ गई। उसकी सासू माँ कई दिनों से बीमार है। सोचा ख़बर भी ले आऊँ और बैठ भी आऊँ। मेरे बैठे-बैठे उसकी तीनों देवरानियाँ भी आ गईं। "अम्मा जी, कैसी हैं?" शिष्टाचारवश पूछ कर इतमीनान से चाय-पानी पीने लगी। फिर एक-एक करके अम्माजी की बातें होने लगी। सिर्फ़ शिकायतें, जब मैं आई तो अम्माजी ने ऐसा कहा, वैसा कहा, ये किया, वो किया। आधा घंटे बाद सब यह कहकर चली गईं कि उन्होंने शाम का खाना बनाना है। बच्चे इन्तज़ार कर रहे हैं। कोई भी अम्माजी के कमरे तक भी न गया। उनके जाने के बाद मैं निशा से पूछ बैठी, निशा अम्माजी, आज एक साल से बीमार हैं और तेरे ही पास हैं। तेरे मन में नहीं आता कि कोई और भी रखे या इनका काम करे, माँ तो सबकी है। उसका उत्तर सुनकर मैं तो जड़-सी हो गई। वह बोली, "बहनजी, मेरी सास सात बच्चों की माँ है। अपने बच्चो को पालने में उनको अच्छी जिंदगी देने में कभी भी अपने सुख की परवाह नही की सबकी अच्छी तरह से परवरिश की। ये जो आप देख रही हैं न मेरा घर, पति, बेटा, शानो-शौकत सब मेरी सासुजी की ही देन है। अपनी-अपनी समझ है। मैं तो सोचती हूँ इन्हें क्या-क्या खिला-पिला दूँ, कितना सुख दूँ, मेरे बेटे बेटी अपनी दादी मां के पास सुबह-शाम बैठते हैं, उन्हे देखकर वो मुस्कराती हैं, अपने कमजोर हाथो से वो उनका माथा चेहरा ओर शरीर सहलाकर उन्हे जी भरकर दुआएँ देती हैँ। जब मैं इनको नहलाती, खिलाती-पिलाती हूँ, ओर इनकी सेवा करती हूँ तो जो संतुष्टि के भाव मेरे पति के चेहरे पर आते है उसे देखकर मैं धन्य हो जाती हूँ। मन में ऐसा अहसास होता है, जैसे दुनिया का सबसे बड़ा सुख मिल गया हो और फिर वह बड़े ही उत्साह से बोली, एक बात और है ये जहाँ भी रहेंगी, घर में खुशहाली ही रहेगी, ये तो मेरा "तीसरा बच्चा बन चुकी हैं।" और ये कहकर वो सुबक-सुबक कर रो पड़ी। मैं इस ज़माने में उसकी यह समझदारी देखकर हैरान थी, मैने उसे अपनी छाती से लगाया और मन ही मन उसे नमन किया और उसकी सराहना की। कि कैसे कुछ निहित स्वार्थी ओर अपने ही लोग तरह-तरह के बहाने बना लेते है तथा अपनी आज़ादी और ऐशो-आराम के लिए अपनी प्यार एवं ममता की मूरत को ठुकरा देते हैं।

दो दोस्त

एक बार दो दोस्त एक बड़ा रेगिस्तान पार कर रहे थे। रास्ते में चलते-चलते उनका किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया और एक दोस्त ने गुस्से में आकर दुसरे दोस्त को थप्पड़ मार दिया। दूसरे दोस्त के यह बात दिल पर लग गई और उसने रेत पर एक लकड़ी से लिखा – “आज मेरा और मेरे दोस्त का एक छोटी सी बात झगड़ा हो गया तो मेरे दोस्त ने मुझे थप्पड़ मार दिया। ”लेकिन रेगिस्तान होने कारण दोनों एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते थे। तो दोनों ने यह तय किया कि बिना बात किये, जब वह मंजिल तक पहुँच जायेंगे तो झगड़ा सुलझा दिया जायेगा। आगे चलने पर एक झील आई तो दोनों ने तरोताजा होने के लिए नहाने का विचार किया। झील के दूसरे किनारे पर बहुत ज्यादा दलदल था। वह दोस्त जिसे चांटा मारा गया था। तैरते-तैरते उस दलदल में फंस गया और डूबने लगा। बाहर खड़े दोस्त ने ये सब देखा तो वह अपने दोस्त को बचाने के लिए वहां गया और बहुत मेहनत के बाद उसे बचाकर बाहर निकाल लिया। जिस दोस्त को बचाया गया था, उसने झील के किनारे एक बड़े पत्थर पर लिखा कि “आज मुझे मेरे दोस्त ने मुझे डूबने से बचाया। ”दूसरे दोस्त ने ये सब देखकर पूछा कि जब मैंने तुम्हें थप्पड़ मारा तो तुमने रेत पर लिखा और जान बचाई तो तुमने पत्थर पर लिखा। तुमने ऐसा क्यों किया? तो दोस्त ने जवाब दिया “जब हमें कोई दुःख पहुंचाता है तो हमें उसे रेत पर लिखना चाहिए। क्योंकि जहां वक्त और माफ़ी की हवाएं उसे मिटा दें। लेकिन जब हमारे साथ कोई अच्छा व्यवहार करें तो उसे पत्थर पर लिखना चाहिए। जिसे कोई नहीं मिटा सकता।
इस कहानी से शिक्षा – जीवन में कभी भी हमें बुरी घटनाओं को दिल पर नहीं लगाना चाहिए।

बालक और उसकी ईमानदारी

प्रतापगढ़ के एक छोटे से गांव में नंदू नाम का एक बालक अपने निर्धन माता-पिता के साथ रहता था। एक दिन दो भाई अपनी फसल शहर में बेचकर ट्रैक्टर से अपने गांव आ रहे थे। फसल बेचकर जो पैसा मिला वो उन्होंने एक थैली में रख दिया था। अचानक एक गड्डा आ गया और ट्रैक्टर उछला और थैली नीचे गिर गई । जिसे दोनों भाई देख नहीं पाएं और सीधे चले गए। बालक नंदू खेलकूद पर रात के अंधेरे में अपने घर जा रहा था। अचानक उसका पैर किसी वस्तु से टकरा गया। देखा तो पता चला कि किसी की थैली है। जब नंदू ने उसे खोलकर देखा तो थैली में नोट भरे हुए थे। वो हैरान हो गया। वह सोचने लगा की पता नहीं किसकी थैली है। उसने सोचा कि अगर यही छोड़ गया तो कोई और इसे उठा ले जाएगा। वो मन ही मन सोचने लगा ‘जिसकी यह थैली है उसे कितना अधिक दुख और कष्ट हो रहा होगा। हालाँकि लड़का उम्र से छोटा था और निर्धन माँ बाप का बेटा था। लेकिन उसमे समझ बूझ काफी अच्छी थी। वह थैली को उठाकर अपने घर ले आया। उसने थैली को झोपड़ी में छुपा कर रख दिया। फिर वापस आकर उसी रास्ते पर खड़ा हो गया उसने सोचा। कोई रोता हुआ आएगा तो पहचान बताने पर उसे थैली दे दूंगा। इधर जब थोड़ी देर बाद दोनों भाई घर पहुंचे तो ट्रैक्टर में थैली नहीं थी । दोनों भाई यह जान निराश होते हुए बहुत दुखी होने लगे। पूरे साल की कमाई थैली में भरी थी। किसी को मिला भी होगा तो कोई बताएगा भी नहीं। शायद अभी वह किसी के हाथ ना लगा हो यह सोच दोनों भाई टॉर्च लेकर उसी रास्ते पर वापस र चले जा रहे थे। छोटा बालक नंदू उन्हें रास्ते में मिला। उसने उन दोनों से कुछ भी नहीं पूछा। लेकिन उसे शंका हुई की शायद वह थैली इन्हीं की हो। उसने उनसे पुछा ‘आप लोग क्या ढूंढ रहे हैं? उन्होंने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने दुवारा पूछा ‘आप दोनों क्या ढूढ़ रहा हो। उन्होंने कहा? अरे कुछ भी ढूंढ रहे हैं तू जा तुझे क्या मतलब। दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे। नंदू उनके पीछे चलने लगा। वो समझ गया था कि नोटों वाली थैली संभवत इन्हीं की ही है।  उसने तीसरी बार फिर पूछा, तो चिल्लाकर एक भाई ने कहा ‘अरे चुप हो जा और हमें अपना काम करने दे। दिमाग को और खराब ना कर। अब नंदू को पूरा विश्वास हो गया कि वे थैली अवश्य ही इन्हीं की ही है। उसने फिर पूछा ‘आपकी थैली खो गई है क्या? दोनों भाई एकदम रुक गए और बोले हां। नंदू बोला ‘पहले थैली की पहचान बताइए। जब उन्होंने पहचान बताई तो बालक उन्हें अपने घर ले गया। टोकरी में रखी थैली उन दोनों भाइयों को सौंप दी। दोनों भाइयों के प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। नंदू की इमानदारी पर दोनों बड़े हैरान थे। उन्होंने इनाम के तौर पर कुछ रुपए देने चाहे, पर नंदू ने मना कर दिया बोला ‘यह तो मेरा कर्तव्य था। दूसरे के दिन वह दोनों भाई नंदू के स्कूल पहुंच गए। उन्होंने बालक के अध्यापक को यह पूरी घटना सुनाते हुए कहा, हम सब विद्यार्थियों के सामने उस बालक को धन्यवाद देने आए। अध्यापक के नेत्रों से आंसू झरने लगे। उन्होंने बालक की पीठ थपथपाई और पूछा ‘बेटा, पैसे से भरे थैले के बारे में अपने माता पिता को क्यों नहीं बताया ? नंदू बोला, गुरूजी मेरे माता-पिता निर्धन हैं । कदाचित उनका मन बदल जाता तो हो सकता है रुपयों को देख कर उसे लौटने नहीं देते और यह दोंनो भाई बहुत निराश हो जाते। यह सोच मैंने घरवालों को थैली के बारे में कुछ भी नहीं बताया। सभी ने नंदू की बड़ी प्रशंसा की और कहा बेटा। धन्यवाद गरीब होकर भी तूने ईमानदारी को नहीं छोड़ा।
इस प्रेरक प्रसंग से शिक्षा - इस कहानी का सार यही है कि सबसे बड़ा गुण इमानदारी का है। ईमानदार होना हमें सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति की स्थिति में ले जाता है। जिस प्रकार इस छोटे से बालक ने अपने ईमान को नहीं खोया भले ही उसकी गरीबी के लिए कष्टदाई थी। लेकिन ईमानदारी व्यक्ति छोटा हो या बड़ा ईमानदारी का गुण ही जीवन के सबसे बड़े गहने हैं। ईमानदारी से ही हमारे व्यक्तित्व को बहुत ही प्रसिद्धि मिलती है। ईमानदार मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम रचना है।

हाथी कैसा होता है? अन्धो की कहानी

एक समय की बात है, एक गांव में 6 अंधे व्यक्ति रहते थे। वह बड़ी खुशी के साथ आपस मे रहते थे। एक बार उनके गांव में एक हाथी आया। जब उनको इस बात की जानकारी मिली, तो वो भी उस हाथी को देखने गये। लेकिन अंधे होने के कारण उन्होंने सोचा हम भले ही उस हाथी को न देख पाए, लेकिन छूकर ज़रूर महसूस करेंगे कि हाथी कैसा होता है। वहां पहुंच कर उन सभी ने हाथी को छूना शुरू किया। हाथी को छूकर एक अंधा व्यक्ति बोला, हाथी एक खंभे की माफिक होता है, मै अब अच्छे से समझ गया हूं, क्योंकि उसने हाथी के पैरों को महसूस किया था। तभी दूसरा व्यक्ति हाथी की पुंछ पकड़ कर बोला “अरे नहीं, हाथी तो रस्सी की तरह होता है।” तभी तीसरा व्यक्ति भी बोल पड़ा “अरे नही, मैं बताता हूँ, यह तो पेड़ के तने की तरह होता है” “तुम लोग क्या बात कर रहे हो, हाथी तो एक बड़े सूपे की तरह होता है”, चौथे व्यक्ति ने कान को छूते हुए सभी को समझाया। तभी अचानक पांचवें व्यक्ति ने हाथी के पेट पर हाथ रखते हुए सभी को बताया “अरे नहीं-नहीं , यह तो एक दीवार की तरह होता है। “ऐसा नहीं है, हाथी तो एक कठोर नली की तरह होता है”, छठे व्यक्ति ने अपनी बात रखी। सभी के अलग अलग मत होने के कारण उन सभी में बहस होने लगी, और खुद को सही साबित करने में लग गए। उनकी बहस तेज होती गयी और ऐसा लगने लगा मानो वो आपस में लड़ ही पड़ेंगे। तभी वहां से एक बुद्धिमान व्यक्ति गुज़र रहा था। उनकी बहस को देखकर, वह वहां रुका और उनसे पूछा, “क्या बात है, तुम सब आपस में झगड़ा क्यों कर रहे हो?” उन्होंने बहस का कारण बताते हुए, उस बुद्धिमान व्यक्ति को बताया कि हम यह नहीं तय कर पा रहे हैं, कि आखिर हाथी दिखता कैसा है”, उन्होंने ने उत्तर दिया। फिर एक एक करके उन्होंने अपनी बात उस व्यक्ति को समझायी। बुद्धिमान व्यक्ति ने सभी की बात शांति से सुनी और बोला, “तुम सब अपनी-अपनी जगह सही हो, तुम्हारे वर्णन में अंतर इसलिए है, क्योंकि तुम सबने हाथी के अलग-अलग भागों को छुआ एवं महसूस किया। लेकिन यदि देखा जाए, तो तुम लोग अपनी अपनी जगह ठीक हो, क्योंकि जो कुछ भी तुम सबने बताया, वो सभी बाते हाथी के वर्णन के लिए सही बैठती हैं”। अब तक सभी को सारी बातें समझ आ गयी थी। उसके बाद उस बुद्धिमान व्यक्ति ने उन्हें समझाया यदि आप सब अपने जो जो महसूस किया, उसके अलावा भी यदि आगे कुछ देखते तो आप को हाथी असल मे कैसा होता है समझ आ जाता।
कहानी से शिक्षा - दोस्तों, अधिकतर ऐसा होता है, कि हम सच्चाई जाने बिना अपनी बात को लेकर अड़ जाते हैं, कि हम ही सही हैं, और बाकी सब गलत है। लेकिन कई बार ऐसा होता है, कि हम केवल सिक्के का एक ही पहलू देख रहे होते है, हमे जरूरत है, सिक्के के दोनो पहलुओं को देखकर समझने की, इसलिए हमें अपनी बात तो रखनी चाहिए पर दूसरों की बात भी सब्र से सुननी चाहिए, और कभी भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहिए।

आज्ञा पालन

एक समय की बात है। रेगिस्तान के किनारे स्थित एक गाँव में एक व्यापारी रहता था। वह ऊँटों का व्यापार करता था। वह ऊँटों के बच्चों को खरीदकर उन्हें शक्तिशाली बनाकर बेचा करता था। इससे वह ढेर सारा लाभ कमाता था। व्यापारी ऊँटों को पास के जंगल में घास चरने के लिए भेज देता था। जिससे उनके चारे का खर्च बचता था। उनमें से एक ऊँट का बच्चा बहुत शैतान था। उसकी हरकतें पूरे समूह की चिंता का विषय था। वह प्राय: समूह से दूर चलता था और इस कारण पीछे रह जाता था। बड़े ऊँट हरदम उसे समझाते थे पर वह नहीं सुनता था इसलिए उन सब ने उसकी परवाह करना छोड़ दिया था। व्यापारी को उस छोटे ऊँट से बहुत प्रेम था इसलिए उसने उसके गले में घंटी बाँध रखी थी। जब भी वह सिर हिलाता तो उसकी घंटी बजती थी जिससे उसकी चाल एवं स्थिति का पता चल जाता था। एक बार उस स्थान से एक शेर गुजरा जहाँ ऊँट चर रहे थे। उसे ऊँट की घंटी के द्वारा उनके होने का पता चल गया था। उसने फसल में से झांककर देखा तो उसे ज्ञात हुआ कि ऊँट का बड़ा समूह है लेकिन वह ऊँटों पर हमला नहीं कर सकता था क्योंकि समूह में ऊँट उससे बलशाली थे। इस कारण वह मौके की तलाश में वहाँ छुपकर खड़ा हो गया। समूह के एक बड़े ऊँट को खतरे का आभास हो गया। उसने समूह को गाँव वापस चलने की चेवातानी दी और उन्हें पास पास चलने को कहा। ऊँटों ने एक मंडली बनाकर जंगल से बाहर निकलना आरम्भ कर दिया। शेर ने मौके की तलाश में उनका पीछा करना शुरू कर दिया। बड़े ऊँट ने विशेषकर छोटे ऊँट को सावधान किया था। कही वह कोई परेशानी न खड़ी कर दे। पर छोटे ऊँट ने ध्यान नहीं दिया और वह लापरवाही से चलता रहा। छोटा ऊँट अपनी मस्ती में अन्य ऊँटों से पीछे रह गया। जब शेर ने उसको देखा तो वह उस पर झपट पड़ा। छोटा ऊँट अपनी जान बचाने के लिए इधर – उधर भागा, पर वह अपने आप को उस शेर से बचा नहीं पाया। उसका अंत बुरा हुआ क्योंकि उसने अपने बड़ों की आज्ञा का पालन नहीं किया था।
शिक्षा – हमें अपनी भलाई के लिए अपने माता – पिता एवं बड़ों की आज्ञा का पालन करना चाहिए।

चतुर चिड़िया

एक दिन की बात है एक चिड़िया आकाश में अपनी उड़ान भर रही होती है। रास्ते में उसे गरुड़ मिल जाता है। गरुड़ उस चिड़िया को खाने को दौड़ता है। चिड़िया उससे अपनी जान की भीख मांगती है। लेकिन गरुड़ उसपर रहम करने को तैयार नहीं होता। तब चिड़िया उसे बताती है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनके लालन पालन के लिए मेरा जीवित रहना जरूरी है। तब गरुड़ इस पर चिड़िया के सामने एक शर्त रखता है कि मेरे साथ दौड़ लगाओ और अगर तुमने मुझे हरा दिया तो मैं तुम्हारी जान बख्श दूंगा और तुम्हें यहां से जाने दूंगा। गरुड़ इस बात को जानता था कि चिड़िया का उसे दौड़ में हराना असंभव है। इसलिए उसके सामने इतनी कठिन शर्त रख देता है। चिड़िया के पास इस दौड़ के लिए हां करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन चिड़िया को इस बात का अंदाजा था कि गरुड़ को दौड़ में हराना नामुमकिन है लेकिन फिर बी वह इस दौड़ के लिए हां कर देती है। पर वह गरुड़ से कहती है कि जब तक ये दौड़ ख़त्म नहीं होता वह उसे नहीं मरेगा। गरुड़ इस बात पर राजी हो जाता है। दौड़ शुरू होती है चिड़िया फट से जाकर गरुड़ के सिर पर बैठ जाती है और जैसे ही गरुड़ दौड़ के आखिरी स्थान पर पहुंचता है चिड़िया फट से उड़ कर लाइन के पार पहुंच जाती ही और जीत जाती है। गरुड़ उसकी चतुरता से प्रसन्न हो जाता है और उसको जिंदा छोड़ देता है। चिड़िया तुरंत ही वहां से उड़ जाती है और अपने रास्ते चल देती है।
शिक्षा :- कठिन परिस्थितियों में हालातों पर रोना नहीं चाहिए बल्कि समझदारी और चतुरता के साथ मुसीबत का सामना करना चाहिए। विरोधी या कार्य आपकी क्षमता से ज्यादा मजबूत हो तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पहले से ही हार मान कर बैठ जाएं बल्कि समझदारी और धैर्य से बैठ कर समस्या का समाधान ढूढ़ना चाहिए। अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए कि हम किसी भी हालत में जीत सकते है।

सुख की तलाश

हफ़ीज अफ़्रीका का एक़ किसान था, खेती करता जो ईश्वर इच्छा से प्राप्त हो जाता रब का शुक्र किया करता, वह अपनी ज़िन्दगी से ख़ुश और सन्तुष्ट था। अफ्रीका में हर जगह हीरे की खदानें थीं, जहां से लोग हीरे तलाश कर दुनियां भर में बेचते और धनवान होते जाते। पर हफीज अपनी मेहनत से जो बन पड़ता अपना और अपने परिवार के लिये पूर्ण पाता और उसमें ही अपने परिवार के साथ खुशी से सुख पूर्वक रहता। एक दिन हफीज का एक रिश्तेदार उसके घर पर आया,वो हीरों का बहुत बड़ा व्यपारी था, उसने हफीज को अफ्रीका में रहते हुये इस तरह गरीबी में रहते देखा तो उसे समझाने लगा, तुम हीरों का काम करो! जितनी मेहनत तुम खेती में करते हो पर कमाते जरूरत भर हो,अगर इतनी मेहनत तुम हीरे ढूंढने में लगाओ तो कहाँ से कहाँ पहुँच जाओगे। छोटे से छोटा हीरा भी बेसकीमती होता है और अगर कहीं अपने अंगूठे भर का भी हीरा पालो तो तुम एक पूरा शहर खरीद सकते हो,और कहीं मुठी भर जितना हीरा मिल जाये तो पूरा अफ्रीका तुम्हारा होगा। सोचो क्या सुख नहीं होगा तुम्हारे पास, हर सुख और सुविधायें, बड़ा घर,गाड़ियां,बच्चों और परिवार के ऐसों आराम की सभी जरूरतें। वो रिश्तेदार ये बातें कर शाम को अपने घर लौट गया।पर अपने पीछे एक चिंतित हफीज को छोड़ गया,आज उसे अपनी मेहनत की कमाई लानत लग रही थी,उसे ऐसा लग रहा था की वो बेकार में ही आदर्शवादी बना फिरता है,उसके जानने वाले सभी कहाँ से कहां पहुंच गये और वो आज भी वहीं का वहीं है,आज उसे अपनी खुद्दारी बोझिल सी लग रही थी,उस रात हफीज सो न सका,उसके मन में आज सन्तुष्टता की बजाये असंतुष्टा घर कर गई थी इसीलिये वो आज दुखी था। अगले दिन सुबह हफीज काम पर नहीं गया,उसने अपने परिवार को बुला अपनी सारी बात उनके सामने रखी,अब मुझे जीवन का मकसद मिल गया है हमें भी अब अमीर होना है,अपने पति में यह परिवर्तन देख उसकी पत्नी ने समझना चाहा"हम अपनी छोटी सी दुनियां में बहुत सुख से हैं,नहीं चाहिये हमें कोई अन्य सुख सुविधायें, आप अपना यह विचार त्याग दीजिये। पर अब हफीज पर अमीर बनने का जुनून सवार हो चुका था,हफ़ीज ने अपने खेतेां को बेचकर कुछ पैसे पत्नी को गुजर बसर के लिये दिये और हीरे खोज़ने के लिये रवाना हो गया। वह हीरों क़ी ख़ोज मेँ पूरे अफ़्रीका मेँ भटकता रहा पर ,बहुत परिश्रम भी किया पर उन्हें पा न सका। पर वो मायूस न हुआ उसने और आगे जाने की सोची। उसने उन्हेँ यूरोप मेँ भी ढूंढा पर वे उसे वहां भी नहीँ मिलें । स्पेन पहुंचते-पहुंचते वह मानसिक,शारिरीक और आर्थिक स्तर पर पूरी तरह टुट चुका था। उसका सारा धन समाप्त हो चुका था उसके पास उस दिन के खाने भर के लिये भी पैसे नहीं थे फिर भी वो भटकता रहा की काश मुझे कोई हीरा मिल जाये। पर आखिर वह इतना मायूस हो चुका था की उसने बर्सिलोना नदी मेँ कुदकर ख़ुद-ख़ुशी क़र अपनी जान दे दी। इधर जिस आदमी ने हफ़ीज के ख़ेत ख़रीदें थे वह एक़ दिन उन ख़ेतों से होंकर बहनें वाले नालेँ मेँ अपने ऊंटों को पानी पिला रहा था तभी सुबह के वक्त ऊग रहें सुरज क़ी किरणेँ नालेँ के दुसरी ओर पढ़े एक़ पत्थर पर पडी और वह इंद्र धनुष क़ी तरह जगमगा ऊठा।बहुत ही सुंदर लग रहा था वो जैसे बर्फ को किसी ने किसी टोकरे में रख दिया हो। यह सोंचकर क़ी वह पत्थर उसकि बैठक मेँ अच्छा दिखेगा उसने उसे उठा क़र अपनी बैठक कक्ष मेँ सजा दिया,संजोग से आज वही हफीज का रिश्तेदार ख़ेतों के इस नए मालिक़ के पास आया,उसनें उस जगमगाते हुए पत्थर को देखा तो हैरानी से उछल पड़ा,ओह!इतना बड़ा और बेसकीमती पत्थर उसने जमीन के नये मालिक से-पूछा - क्या हफ़ीज लौट आया ?नए मालिक़ ने जवाब दिया- नहीँ लेक़िन आपने यह सवाल क़्यों पूछा?
अमीर रिश्तेदार आदमीं ने ज़वाब दिया क्योंकी यह हीरा हैँ, मैं उन्हें देखतें ही पहचान जाता हूँ ।नए मालिक़ ने कहा- नहीँ यह तो महज एक़ पत्थर हैँ, मैने उसे नाले के पास से उठाया हैँ। चलिए मैं आपक़ो दीखाता हूँ, वहां ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े हुए हैँ।उन्होनें वहां से बहुत सरे पत्थर उठाए और उन्हेँ जांचने परखने के लिये भेंज दिया।वे सभी पत्थर हीरे ही साबित हुए। उन्होनें पाया क़ी उस ख़ेत में दूर-दूर तक़ हीरे दबे हुए थे। जमीन का नया मालिक दुनियां का सबसे अमीर आदमी बन चुका था।
कथा सार - परमात्मा ने मुझे और सभी को अपनी प्रारब्ध अनुसार भरपूर दिया हुआ है। जो इस नेमत को न देख और,और,और कि चाह में भटकते हैं,वे सदा दुख ही पाते हैं। उसकी नेमत को देख,अपनी भरपूरता का अनुभव कर सदेव मालिक का शुक्रगुजार होने में ही वास्तविक सुख है!!

भलाई का जज्बा

एक बार एक राजा ने एक कैदी को मौत की सजा सुनाई। सजा सुनकर कैदी आप खो बैठा। वह बादशाह को गालियां देने लगा। कैदी दरबार के आखिरी कोने में खड़ा था। इसलिए उसकी गालियां बादशाह को सुनाई नहीं पड़ रहीं थीं। इसलिए बादशाह ने अपने वजीर से पूछा कि वह क्या कह रहा है ? इस पर वजीर ने बताया, “महाराज, कैदी कह रहा है कि वे लोग कितने अच्छे होते हैं जो अपने क्रोध को पी जाते हैं और दूसरों को क्षमा कर देते हैं।” यह सुनकर बादशाह को दया आ गई और उसने कैदी को माफ कर दिया। लेकिन दरबारियों में एक व्यक्ति था जो वजीर से जलता था। उसने कहा, “महाराज, वजीर ने आपको गलत बताया है। “यह व्यक्ति आपको गंदी गंदी गालियां दी रहा है। आप इसको माफ मत करिए।” उसकी बात सुनकर बादशाह गुस्सा हो गया और दरबारी से बोला- “मुझे वजीर की बात ही सही लगी। क्योंकि इसने झूठ भी बोला है तो किसी की भलाई के लिए। इसके अंदर भलाई का जज्बा तो है। जबकि तुम दरबार में रहने के योग्य नहीं हो। तुम्हें तुरंत बेदखल किया जाता है।”
सीख- Moral :- हमेशा अपने व्यवहार और वाणी से दूसरों की भलाई के बारे में ही सोचना चाहिए। वो झूठ भी सत्य के बराबर है जहाँ किसी की भलाई हो या जिंदगी बचने का सवाल हो। 

समय की कीमत

एक समय की बात है सुबह-सुबह एक गरीब व्यक्ति राजा के दरबार में पहुँचता है। और राजा को अपनी गरीबी की करुण गाथा बताने लगता है। राजा को उस व्यक्ति की दरिद्रा की कहानी सुनकर बहुत ही ज्यादा दुःख होता है और उस व्यक्ति के लिए दया आ जाती है। करुणा के भाव से राजा उस दरिद्र से कहता है कि तुम आज सूर्यास्त होने से पहले खजाने में से जितना धन ले जा सको ले जाओ। वह दरिद्र व्यक्ति राजा की इस बात को सुनकर बहुत ही ज्यादा खुश हो जाता है, वह सोचने लगता है की अब दुःख के दिन गए सूर्यास्त होने में तो अभी बहुत समय है आज दिन भर में तो मै इतना धन राजकोष से ले जाऊंगा जितने में मेरा कई पीढ़ी आराम से जीवन भर खा सकेगा। यह सोचकर वह व्यक्ति प्रसन्नता की लालिमा लिए अपने घर की तरह चला गया और घर पहुंचकर अपनी पत्नी को सारी बातें सुना डाली की किस प्रकार उनके लिए राजा के मन में कितनी उदारता है। पत्नी भी पति की इस बात को सुनकर खुशी से आनंदित हो उठी और बोली – यह तो बड़ी सौभाग्य की बात है, आप तुरंत जाइये और जितना अधिक हो वहां से धन लेकर आइये। दरिद्र व्यक्ति बोला – मुर्ख स्त्री कितने दिन हो गए हैं मेने भोजन तक नहीं किया है ऐसे में भूखा रहकर धन को कैसे उठा कर ला पाउँगा भला? ऐसा कर पहले तू कहीं से उधार लेकर मेरे लिए भोजन तो बना। मै तो भोजन करके ही जाऊंगा वैसे भी सारा दिन पड़ा है धन लाने के लिए अभी जल्दबाजी भी क्या है। बेचारी स्त्री क्या करती दौड़ी-दौड़ी गयी और बनिए से उधार में सामान लेकर आयी। जल्दी से खाना बनायीं और पति को खिलाई फिर राजमहल जाने के लिए तुरंत आग्रह करने लगी। परन्तु दरिद्र व्यक्ति ने आज बहुत दिनों बाद डट कर खाना खाया था, उसे खाना खाते ही आलश्य आ गया उसने सोंचा कि थोड़ी देर में जाकर सोना ले आऊंगा अभी थोड़ा आराम कर लेता हूँ अतः वह आराम करने के लिए टेल गया। व्यक्ति गहरी नींद का आनंद लेने लगा, जैसे-तैसे करके उसकी पत्नी ने उसे उठाया और राजमहल की तरफ रवाना कर दिया। वह व्यक्ति रास्ते में कुछ ही दूर गया था कि उसे एक नट दिखा जो बड़ा ही सुन्दर अभिनय कर रहा था व्यक्ति ने सोंचा क्यों ना कुछ समय तक यह नाटक देख लिया जाये फिर राजमहल तो जाना ही है। और एक बार भी वहां से हीरे जवाहरात ले आता हूँ फिर तो आराम ही आराम है। वह व्यक्ति नाटक देखने के लिए वहीँ बैठ गया व देखते ही देखते वह राजमहल जाकर धन लाने की बात को भूल गया। जब नाटक समाप्त हुआ तब उसे धन वाली बात याद आयी और वह दौड़ते भागते राजमहल के पास पंहुचा अफसोस दिया हुआ समय निकल चूका था सूर्य अस्त हो चुकी थी। बेचारे व्यक्ति को एक फूटी कौड़ी नसीब नहीं हुई वह जोर-जोर से रोता व सर को पटकता हुआ घर की तरफ वापस लौटा उसने समय की कीमत को नहीं समझा इसलिए उसे पछताना पड़ा। 
इसलिए कहा भी गया है –
अब पछिताये होत क्या
जब चिड़िया चुग गयी खेत

दोस्तों समय का हमेशा सदुपयोग करें यह कितना कीमती है इसे बताने की आवश्यकता नहीं है इसे आप भली भांति समझते हैं। क्योंकि पैसा अगर एक बार चला गया तो उसे दोबारा पाया जा सकता है परन्तु जो समय बीत जाता है वह वापस नहीं आता।

काम लेने का तरीका

एक खेत में कुछ मजदूर काम कर रहे थे। एक गहनता काम करने के बाद वे बैठकर आपस में गप्पें मारने लगे। यह देखकर खेत के मालिक ने उनसे कुछ नहीं कहा। उसने खुरपी उठायी और खुद काम में जुट गया। मालिक को काम करता देख मजदूर शर्म के मारे तुरंत काम में जुट गए। दोपहर में मालिक मजदूरों के पास जाकर बोला, “भाइयों! अब काम बंद कर दो। भोजन कर के आराम कर लो। काम बाद में होगा।” मजदूर खाना खाने चले गए। थोड़ा आराम करके वे शीघ्र ही फिर काम पर लौट आये। शाम को छुट्टी के समय पड़ोसी खेत वाले ने उस खेत के मालिक से पूछा, ” भाई! तुम मजदूरों को छुट्टी भी देते हो। उन्हें डांटते भी नहीं हो। फिर भी तुम्हारे खेत का काम मेरे खेत से दोगुना कैसे हो गया। जबकि मैं लगातार अपने मजदूरों पर नजर रखता हूँ । डांटता भी हूँ और छुट्टी भी नहीं देता।” तब पहले खेत के मालिक ने बताया, “भैया! मैं काम लेने के लिए सख्ती से अधिक स्नेह और सहानुभूति को प्राथमिकता देता हूँ। इसलिए मजदूर पूरा मन लगाकर काम करते हैं। इससे काम ज्यादा भी होता है और अच्छा भी।”

हमे हमेशा कुछ ना कुछ सीखते रहना चाहिए - आज की प्रेरक कहानी

किसी गांव मे एक कारीगर रहता था जिसका एक लड़का था। कारीगर अपनी छोटी सीझोपड़ी मे टोकरी बनाता था जिन्हे वह 20-20 रूपये मे बेचा करता था। अब कारीगर बूढ़ा हो चुका था उसने सोचा कि मैं अपने बेटे को यह टोकरी बनाने का काम सिखाता हूं लड़के से कहा कि तुम उसे सीख लो मैंने तुम्हारे दादा जी से सीखा है। ये हमारी पीढियों से चला आ रहा काम है।
अच्छा काम हैं। लड़का भी मान गया टोकरी बानने का काम सीखने को। पिताजी ने लडका को टोकरी बनानी सिखायी और उसे बाजार मे बेचकर आने को कहा। लडका टोकरी को लेकर बाजार गया। और बेचकर आया ही था पिताजी ने पूछा कि उदास क्यों हो। लडका बोला कि मेरी बनाई हुई टोकरी केवल दसरूपये मे ही बिकी। पिताजी ने कहा चलो कोई बात नही आज तुम्हें और अच्छी टोकरी बनाना सिखाता हूँ।
पिताजी ने और अच्छी टोकरी बनाना सिखाई और उसे बाजार मे बेचने को कहा। लडका टोकरी लेकर बाजार गया और अपनी बनाई टोकरी को पंद्रह रूपये मे बेचकर आया। लडका अब भी उदास था। पिताजी ने फिर उदासी का कारण पूछा तो लडके ने कहा कि टोकरी केवल पंद्रह रूपये मे ही बिकी। पिताजी ने कहा कोई बात नही धीरे धीरे तुम्हारी बनाई हुई टोकरी अच्छे दामों मे बिकने लगेगी तुम अच्छे से टोकरी बनाना सिखते रहो। पिताजी ने और अधिक अच्छी टोकरी सिखाई और टोकरी बनाकर बेचने को कहा। लडका बाजार गया और उस दिन उसकी टोकरी 30 रूपये मे बिक गई। लडका बहुत खुश हुआ। पिताजी ने पूछा कि आज कितने रूपये की टोकरी बेची। लडके ने कहा आज मेरी बनाई टोकरी 30 रूपये की बिकी हैं।
पिताजी ने यह सब सुनकर लडके से कहा बहुत अच्छा है। चलो आज तुम्हें ऐसी टोकरी सिखाऊंगा जो 40 रूपये मे बिक सके। लडके ने कहा बस पिताजी आप खुद 20 रूपये की टोकरी बेचते आये हो आप मुझे 40 की टोकरी बनाना कैसे सिखाओगे। आप रहने दो आपसे ज्यादा रूपये की टोकरी तो मैं बनाना जानता हूँ। इतना सुनकर पिताजी ने कहा ऐसा ही कुछ मैने भी कहा था जब मेरे पिताजी खुद 15 रूपये की टोकरी बेचते थे और एक दिन मेरी टोकरी 20 रूपये मे बिक गयीं। मेरे पिताजी ने मुझे 25 रूपये की टोकरी सिखाने को कहा था तो मैने भी सिखने के लिए मना कर दिया था।
और कहा था कि आप खुद 15 की बेचते आये हैं। आपसे ज्यादा की तो बेचकर आया हूँ। और तब से जीवन भर बीस रूपये की ही टोकरी बेचता रहा क्योंकि उससे ज्यादा की टोकरी मैं सीख ही नहीं पाया।
ये कहानी हमे सिखाती है की जहां से कुछ भी सीखने को मिले बस सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए, ओर हमे थोडा सा कुछ भी सीख जाने पर यह घमंड नही होना चाहिए कि अब मैं सब कुछ जानता हूँ। क्योंकि ऐसा हो सकता है कि हर कोई कुछ ना कुछ आपसे अधिक जानता हो। हमे हमेशा कुछ ना कुछ सीखते रहना चाहिए। जहां से भी मिल सके, बस ग्रहण करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

भाग्य - प्रेरक कहानी

सुनो, मां....
वो अपनी कालोनी मे रमेश जी है ना...अरे वहीं हमारी गली के मोड पर जिनका तीन मंजिला मकान है उन्होंने बुलाया है अपना मकान बेचना चाहते हैं सुरेंद्र जी ने अपनी मां से कहा...क्या .... मगर कयुं सुरेंद्र ... उनकी बेटी सुधा है ना उस की शादी के लिए वह अपना मकान बेचना चाहते है अब मेरा काम तो है ही प्रोपर्टी डीलिंग का सो .....कहो तो देख आऊं ....सुरेंद्र जी ने अपनी बुजुर्ग मां से पूछा .... काम है हमारा हो तो ठीक है जा देख ले सुरेंद्र ..... मगर बेटा बेटी की शादी को मकान बेच देगे तो रहेंगे कहां....उनके आसरे का कया हो....गा.....कहते हुए बुजुर्ग मां का गला रुंधा सा गया....सच बेटा.....जाने कैसी रीति बनाई है की बेटियों के घर बसाने के लिए अपने ही घरों को बेचना पड़ता है बेटियों के घरवालों को .....सुरेंद्र जी रमेश जी के यहां पहुंचे .....और मकान देखकर बोले -जी कहिए ...कया डिमांड है आपकी .... डिमांड कया भाईसाहब .....अच्छी कीमत मिल जाए बस ....एक बेटी और एक बेटा है ...बेटी की शादी अच्छे से हो जाए बस ... और आप ...मेरा मतलब भाभीजी और बेटे सहित आप कहा रहेंगे ...
रहेंगे कही किराए के मकान मे ......आपको तो पता है अच्छे लडके मिलते ही कहा है ...शादी खर्च ...दहेज ...रिश्तेदारों को लेनदेन ....बहुत पैसा लगता है .... अभी बात सौदेबाज़ी की हो ही रही थी की रमेश जी की बेटी सुधा चाय लेकर आ गई ....अंकलजी ...चाय ...सिर झुकाकर नमस्ते कर सुधा ने कहा ... सुरेंद्र जी ने सुधा को सिर से पैरों तक निहारा .....वहीं सादगी ...सलवार सूट मे ...जैसी उसने आजतक अपनी मां मे देखी थी वैसे ही मुसकुराते सिर झुकाकर घर आए मेहमानों का आदर करना .... भाई रमेश जी .....ये सौदेबाजी को छोडिये .....मेरे पास आपके लिए एक सुझाव है जिससे आप अपने मकान को भी नही बेचेंगे और सुधा बिटिया की शादी भी हो जाएगी ....रमेश जी उनकी पत्नी बेटे और बेटी सुधा सहित सभी आश्चर्य से सुरेंद्र जी को देखने लगे.... जी हां....आप मेरे बेटे मोहन को तो जानते ही होगे ... जो दुकान पर बैठता है टीवी शोरूम पर ....उसके लिए आप मेरी झोली में सुधा बिटिया को डाल दीजिए ...और मुझे कोई दान दहेज नही चाहिए बस दो कपडो मे एक बेटी चाहिए .....शादी मंदिर मे खास रिश्तेदारों के साथ करवा देगे और उसके बाद एक बडा रिसेप्शन हम अपने यहां करवाएंगे ताकि सभी रिश्तेदार और कालोनी वालो का मुंह मीठा हो जाए .... वैसे मे आपके यहां अपने बेटे मोहन को बुलवा लेता हूं आप सभी देख मिल लीजिए ...यदि आप सभी की खासकर सुधा बिटिया की रंजामंदी होगी तो बात आगे बढाएंगे ..
रमेश जी भीगी हुई पलकों से कभी अपने मकान को तो कभी अपनी बिटिया सुधा के भाग्य को देखने की कोशिश कर रहे थे .....आखिर सुरेंद्र जी के कहने पर मोहन सुधा के परिवार से मिलने आया और सभी को पसंद भी आ गया ...दोनों परिवार की रजामंदी से खुशी खुशी दोनो विवाह सूत्र मे बंध गए।

दुनिया के 7 आश्चर्य प्रेरक प्रसंग

गाँव के स्कूल में पढने वाली छुटकी आज बहुत खुश थी, उसका दाखिला शहर के एक अच्छे स्कूल में क्लास 6 में हो गया था। आज स्कूल का पहला दिन था और वो समय से पहले ही तैयार हो कर बस का इंतज़ार कर रही थी। बस आई और छुटकी बड़े उत्साह के साथ उसमे सवार हो गयी। करीब 1 घंटे बाद जब बस स्कूल पहुंची तो सारे बच्चे उतर कर अपनी-अपनी क्लास में जाने लगे…छुटकी भी बच्चों से पूछते हुए अपनी क्लास में पहुंची। क्लास के बच्चे गांव से आई इस लडकी को देखकर उसका मजाक उड़ाने आगे। “साइलेंस!”, टीचर बोली, “ चुप हो जाइए आप सब…” “ये छुटकी है, और आज से ये आपके साथ ही पढेगी।” उसके बाद टीचर ने बच्चों को सरप्राइज टेस्ट के लिए तैयार होने को कह दिया। “चलिए, अपनी-अपनी कॉपी निकालिए और जल्दी से “दुनिया के 7 आश्चर्य लिख डालिए।”, टीचर ने निर्देश दिया। सभी बच्चे जल्दी जल्दी उत्तर लिखने लगे, छुटकी भी धीरे-धीरे अपना उत्तर लिखने लगी। जब सबने अपनी कॉपी जमा कर दी तब टीचर ने छुटकी से पूछा, “क्या हुआ बेटा, आपको जितना पता है उतना ही लिखिए, इन बच्चों को तो मैंने कुछ दिन पहले ही दुनिया के सात आश्चर्य बताये थे।” “जी, मैं तो सोच रही थी कि इतनी सारी चीजें हैं…इनमे से कौन सी सात चीजें लिखूं….”, छुटकी टीचर को अपनी कॉपी थमाते हुए बोली। टीचर ने सबकी कापियां जोर-जोर से पढनी शुरू कीं..ज्यादातर बच्चों ने अपने उत्तर सही दिए थे…
  1. ताजमहल
  2. चीचेन इट्ज़ा
  3. क्राइस्ट द रिडीमर की प्रतिमा
  4. कोलोसियम
  5. चीन की विशाल दीवार
  6. माचू पिच्चू
  7. पेत्रा
टीचर खुश थीं कि बच्चों को उनका पढ़ाया याद था। बच्चे भी काफी उत्साहित थे और एक दुसरे को बधाई दे रहे थे… अंत में टीचर ने छुटकी की कॉपी उठायी, और उसका उत्तर भी सबके सामने पढना शुरू किया….
दुनिया के 7 आश्चर्य हैं:
  1. देख पाना
  2. सुन पाना
  3. किसी चीज को महसूस कर पाना
  4. हँस पाना
  5. प्रेम कर पाना
  6. सोच पाना
  7. दया कर पाना
छुटकी के उत्तर सुन पूरी क्लास में सन्नाटा छा गया। टीचर भी आवाक खड़ी थी….आज गाँव से आई एक बच्ची ने उन सभी को भगवान् के दिए उन अनमोल तोहफों का आभास करा दिया था जिनके तरफ उन्होंने कभी ध्यान ही नहीं दिया था ! सचमुच , गहराई से सोचा जाए तो हमारी ये देखने…सुनने…सोचने…समझने… जैसी शक्तियां किसी आश्चर्य से कम नहीं हैं, ऐसे में ये सोच कर दुखी होने ने कि बजाये कि हमारे पास क्या नहीं है हमें ईश्वर के दिए इन अनमोल तोहफों के लिए शुक्रगुजार होना चाहिए और जीवन की छोटी-छोटी बातों में छिपी खुशियों को मिस नहीं करना चाहिए।

हमेशा सीखते रहो

एक बार गाँव के दो व्यक्तियों ने शहर जाकर पैसे कमाने का निर्णय लिया. शहर जाकर कुछ महीने इधर-उधर छोटा-मोटा काम कर दोनों ने कुछ पैसे जमा किये. फिर उन पैसों से अपना-अपना व्यवसाय प्रारंभ किया. दोनों का व्यवसाय चल पड़ा. दो साल में ही दोनों ने अच्छी ख़ासी तरक्की कर ली. व्यवसाय को फलता-फूलता देख पहले व्यक्ति ने सोचा कि अब तो मेरे काम चल पड़ा है. अब तो मैं तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ता चला जाऊंगा. लेकिन उसकी सोच के विपरीत व्यापारिक उतार-चढ़ाव के कारण उसे उस साल अत्यधिक घाटा हुआ। अब तक आसमान में उड़ रहा वह व्यक्ति यथार्थ के धरातल पर आ गिरा. वह उन कारणों को तलाशने लगा, जिनकी वजह से उसका व्यापार बाज़ार की मार नहीं सह पाया. सबने पहले उसने उस दूसरे व्यक्ति के व्यवसाय की स्थिति का पता लगाया, जिसने उसके साथ ही व्यापार आरंभ किया था. वह यह जानकर हैरान रह गया कि इस उतार-चढ़ाव और मंदी के दौर में भी उसका व्यवसाय मुनाफ़े में है. उसने तुरंत उसके पास जाकर इसका कारण जानने का निर्णय लिया. अगले ही दिन वह दूसरे व्यक्ति के पास पहुँचा। दूसरे व्यक्ति ने उसका खूब आदर-सत्कार किया और उसके आने का कारण पूछा। तब पहला व्यक्ति बोला, “दोस्त! इस वर्ष मेरा व्यवसाय बाज़ार की मार नहीं झेल पाया. बहुत घाटा झेलना पड़ा. तुम भी तो इसी व्यवसाय में हो. त्तुमने ऐसा क्या किया कि इस उतार-चढ़ाव के दौर में भी तुमने मुनाफ़ा कमाया?” यह बात सुन दूसरा व्यक्ति बोला, “भाई! मैं तो बस सीखता जा रहा हूँ, अपनी गलती से भी और साथ ही दूसरों की गलतियों से भी. जो समस्या सामने आती है, उसमें से भी सीख लेता हूँ. इसलिए जब दोबारा वैसी समस्या सामने आती है। तो उसका सामना अच्छे से कर पाता हूँ और उसके कारण मुझे नुकसान नहीं उठाना पड़ता. बस ये सीखने की प्रवृत्ति ही है, जो मुझे जीवन में आगे बढ़ाती जा रही है.” दूसरे व्यक्ति की बात सुनकर पहले व्यक्ति को अपनी भूल का अहसास हुआ. सफ़लता के मद में वो अति-आत्मविश्वास से भर उठा था और सीखना छोड़ दिया था. वह यह प्रण कर वापस लौटा कि कभी सीखना नहीं छोड़ेगा. उसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ता चला गया।
हमेशा सीखते रहो प्रेरक प्रसंग कहानी से शिक्षा :-
दोस्तों, जीवन में कामयाब होना है, तो इसे पाठशाला मान हर पल सीखते रहिये. यहाँ नित नए परिवर्तन और नए विकास होते रहते हैं. यदि हम स्वयं को सर्वज्ञाता समझने की भूल करेंगे, तो जीवन की दौड़ में पिछड़ जायेंगे. क्योंकि इस दौड़ में जीतता वही है, जो लगातार दौड़ता रहता है. जिसें दौड़ना छोड़ दिया, उसकी हार निश्चित है. इसलिए सीखने की ललक खुद में बनाये रखें, फिर कोई बदलाव, कोई उतार-चढ़ाव आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता।

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